भाग्य साथ न दे
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काल सर्प योग से सम्बन्धित कथा
पौराणिक
कथा के अनुसार सिंघिका नामक राक्षस का पुत्र स्वरभानु था जो बहुत ही
शक्तिशाली था। स्वरभानु ने ब्रह्मा जी की कठोर तपस्या की। तपस्या से
प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने स्वरभानु को वरदान दिया जिससे उसे ग्रह मंडल
में स्थान प्राप्त हुआ। स्वरभानु किस प्रकार राहु केतु के नाम से जाना गया
इसकी कथा सागर मंथन से जुड़ा है। सागर मंथन के समय देवताओं और दानवों में
एक समझौता हुआ जिसके तहत दोनों ने मिलकर सागर मंथन किया। इस मंथन के दौरान
सबसे अंत में भगवान धनवन्तरी अमृत कलश लेकर प्रकट हुए। अमृत पाने के लिए
देवताओं और दानवों में संघर्ष की स्थिति पैदा होने लगी। भगवान विष्णु तब
मोहिनी रूप धारण करके उनके बीच प्रकट हुए और देवताओं व दानवों को अलग अलग
पंक्तियों में बैठाकर अमृत बांटने लगे। अपनी चतुराई से मोहिनी रूप धारण
किये हुए भगवान विष्णु केवल देवताओं को अमृत पिला रहे थे जिसे दानव समझ
नहीं पा रहे थे परंतु स्वरभानु मोहिनी की चतुराई का समझकर देवताओं की टोली
में जा बैठा।
अमृत वितरण के क्रम में मोहिनी ने
स्वरभानु को देवता समझकर उसे भी अमृत पान करा दिया परंतु सूर्य और चन्द्रमा
ने उसे पहचान लिया तब विष्णु ने सुदर्शन चक्र से स्वरभानु का सिर धड़ से
अलग कर दिया। चुंकि अमृत स्वरभानु के जीभ और गर्दन को छू गया था अत: वह सिर
कट जाने पर भी जीवित रहा। ब्रह्मा जी ने स्वरभानु से कहा कि तुम्हारा सिर
राहु के नाम से जाना जाएगा और धड़ जो सांप की तरह है वह केतु के रूप में
जाना जाएगा। इस घटना के बाद से ही स्वरभानु राहु केतु के रूप में विख्यात
हुआ। सूर्य और चन्द्रमा के कारण ही उसे इस स्थिति से गुजरना पड़ा था इसलिए
वह उसे अपना शत्रु मानने लगा। पौराणिक कथा के अनुसार राहु केतु सूर्य और
चन्द्रमा को निगल लेता है जिससे सूर्य ग्रहण और चन्द्र ग्रहण होता है।
अन्य
ग्रहों की अपेक्षा राहु और केतु में एक महत्वपूर्ण अन्तर यह है कि जहां
अन्य ग्रह घड़ी की विपरीत दिशा में चलते हैं वहीं राहु केतु घड़ी की दिशा
में भ्रमण करते हैं। राहु केतु में एक अन्य विशेषता यह है कि दोनों एक
दूसरे से सातवें घर में स्थित रहते हैं. दोनों के बीच 180 डिग्री की दूरी
बनी रहती है।
ऋग्वेद के अनुसार राहु केतु ग्रह
नहीं हैं बल्कि असुर हैं। अमावस्या के दिन सूर्य और चन्द्र दोनों आमने
सामने होते हैं उस समय राहु अपना काम करता है जिससे सूर्य ग्रहण होता है।
उसी प्रकार पूर्णिमा के दिन केतु अपना काम करता है और चन्द्रग्रहण लगता है।
वैदिक परम्परा में विष्णु को सूर्य भी कहा गया है जो दीर्घवृत्त के समान
हैं। राहु केतु दो सम्पात बिन्दु हैं जो इस दीर्घवृत्त को दो भागों में
बांटते हैं। इन दो बिन्दुओं के बीच ग्रहों की उपस्थिति होने से कालसर्प योग
बनता है जो व्यक्ति के पतन का कारक माना जाता है।
काल सर्प योग के विषय में ज्योतिषशास्त्रीयों की राय (Astrologer Says about Kalsarp yoga):
कुछ
ज्योतिषशास्त्री कहते हैं कि इस योग को यूरेनस, नेप्च्युन और प्लुटो सहित
सभी ग्रहों के साथ आंकलन करना चाहिए। लेकिन ऐसी स्थिति में यह योग बहुत
मुश्किल से बनता है। यही कारण है कि इसके लिए मुख्य सात ग्रहों को ही सामने
रखकर आंकलन किया जाता है। इस योग के आंकलन के लिए कुछ विशेष बातों को
ध्यान में रखना आवश्यक माना गया है।
ग्रह अगर राहु और केतु के
मध्य हो तब यह योग बनता है। अगर ग्रह केतु और राहु के मध्य हो तो काल सर्प
योग नहीं माना जाएगा। गणना के समय लग्न से घड़ी की विपरीत दिशा में राहु और
केतु के मध्य जब ग्रह होंगे तब काल सर्प योग कहा जाएगा। ध्यान देने वाली
बात है कि इस गणना में यूरेनस, नेप्च्युन और प्लुटो को शामिल नहीं किया
जाता है।
कालसर्प योग की गणना में ध्यान देने
वाली बात यह भी है कि सभी ग्रह एक अर्घवृत्त के अंदर होने चाहिए अगर कोई
ग्रह एक डिग्री भी बाहर है तो यह योग नहीं बनेगा। उदाहरण के तौर पर राहु
अगर कर्क राशि से 15 डिग्री पर है और उसी राशि से चन्द्रमा अगर 16 डिग्री
पर है तो इस स्थिति में यह योग नहीं बनेगा।
काल
सर्प योग के ज्योतिषशास्त्री अशुभ योग मानते है परंतु बहुत से ऐसे व्यक्ति
हैं जिनकी कुण्डली में यह योग होने से वह सम्मानित पदों पर विराजमान हुए
हैं। लेकिन इस योग के विषय में यह भी तय है कि जिनकी कुण्डली में यह योग
होता है वह भले ही कितनी भी उंचाई पर पहुंच जाएं परंतु एक दिन उन्हें ज़मीन
पर आना ही होता है।
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